NCERT Solutions Class 12 समाजशास्त्र (भारतीय समाज) Chapter-4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

NCERT Solutions Class 12 समाजशास्त्र Chapter-4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

NCERT Solutions Class 12 समाजशास्त्र (भारतीय समाज) 12 वीं कक्षा से Chapter-4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में के उत्तर मिलेंगे। यह अध्याय आपको मूल बातें सीखने में मदद करेगा और आपको इस अध्याय से अपनी परीक्षा में कम से कम एक प्रश्न की उम्मीद करनी चाहिए। 
हमने NCERT बोर्ड की टेक्सटबुक्स हिंदी  समाजशास्त्र Sociology के सभी Questions के जवाब बड़ी ही आसान भाषा में दिए हैं जिनको समझना और याद करना Students के लिए बहुत आसान रहेगा जिस से आप अपनी परीक्षा में अच्छे नंबर से पास हो सके।
Solutions Class 12 समाजशास्त्र (भारतीय समाज) Chapter-4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में


CBSE एनसीईआरटी प्रश्न-उत्तर

Class 12 समाजशास्त्र Sociology

पाठ-4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

1. 'अदृश्य हाथ' से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- 'अदृश्य हाथ' का अर्थ = एडम स्मिथ के अंतर्गत, 'प्रत्येक व्यक्ति अपने लाभ को बढ़ाने की सोचते है और ऐसा करते हुए वह जो भी करता हैं, स्वत: ही समाज के या सभी के हित में होता है। इस प्रकार, ऐसा प्रतीत होता है कि कोई एक अदृश्य बल यहाँ काम करता है, जो इन व्यक्तियों के लाभ की प्रवृत्ति को समाज के लाभ में बदल देता है। एडम स्मिथ के द्वारा इस अदृश्य शक्ति को 'अदृश्य हाथ' का नाम दिया।

2. बाज़ार पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण, आर्थिक दृष्टिकोण से किस तरह अलग है?

उत्तर- आधुनिक अर्थशास्त्र की विचारधारा को एडम स्मिथ ने विकसित किया। इस विचारधारा के अनुसार ,अर्थव्यवस्था को एक पृथक हिस्से के रूप में पढ़ा जा सकता है, जो बड़े सामाजिक एवं राजनीतिक संदर्भ से भिन्न है, जिसमें बाज़ार अपने स्वयं के नियमों के अंतर्गत काम करता है।

दूसरी तरफ, समाजशास्त्रियों ने बड़े सामाजिक ढाँचे समझने के अंदर आर्थिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझने के लिए एक वैकल्पिक तरीके का विकास करने का प्रयास किया है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि कि बाज़ार सामाजिक संस्थाएँ हैं, जो विशेष सांस्कृतिक तरीकों द्वारा निर्मित हैं | इनका मानना है कि अर्थशास्त्र समाजशास्त्र में रच-बस गया है।

3. किस तरह से एक बाजार जैसे कि एक साप्ताहिक ग्रामीण बाज़ार, एक सामाजिक संस्था है?

उत्तर- बाज़ार आर्थिक अंतःक्रिया का स्थल माना जाता हैं। ये सामाजिक संदर्भ तथा सामाजिक वातावरण पर आधारित होता है। इसे एक ऐसा सामाजिक संगठन भी कहा जा सकता हैं, जिसमे विशेष प्रकार की सामाजिक अंतःक्रियाएँ संपन्न होती हैं। अनियतकालीन बाजार (या साप्ताहिक बाजार) सामाजिक तथा आर्थिक संगठन की प्रमुख विशेषता है। यह आसपास के गाँवों को अवसर प्रदान करता है कि जो अपनी वस्तुओं की खरीद-बिक्री के साथ-साथ एक-दूसरे के साथ अंत:क्रिया करें। गाँवों में, जनजातीय क्षेत्रों में नियमित बाज़ारों के अतिरिक्त विशेष बाजारों के अतिरिक्त विशेष बाज़ारों का भी आयोजन किया जाता है। इनमे मुख्य प्रकार के उत्पादों की बिक्री की जाती है। उदाहरण, राजस्थान में पुस्कर। यहाँ बाहर के व्यापारी, ज्योतिषी, साहूकार, प्रदर्शक,इत्यादि अपनी सेवाओं तथा उत्पादों के विक्रय के लिए आते हैं। इस तरह के अनियतकालीन बाज़ार केवल स्थानीय लोगों की जरूरतों की ही पूर्ति नहीं करते, वे गाँवों को क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था एवं राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से भी जोड़ते हैं। इस प्रकार से, जनजातीय क्षेत्रों में लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं, जिससे इस प्रकार के बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में परिवर्तित हो जाते  हैं।

4. व्यापार की सफलता में जाति एवं नातेदारी संपर्क कैसे योगदान कर सकते हैं?

उत्तर-पूर्व उपनिवेशकाल तथा उसके बाद, भारत के न केवल भारत बल्कि विश्व के अन्य देशों के साथ भी विस्तृत व्यापारिक संबंध थे। ये व्यापारिक संबध उन व्यापारिक समूहों के द्वारा बनाए गए, जिन्होंने आंतरिक तथा बाह्य व्यापार किए। इस प्रकार के व्यापार समुदाय आधारित रिश्तेदारों तथा जातियों के द्वारा किए जाते थे। इन सभी में विश्वास व ईमानदारी ,की भावना होती थी। विस्तृत संयुक्त परिवार की संरचना तथा नातेदारी व जाति के द्वारा व्यवसाय के निर्माण का उदाहरण हम तमिलनाडु के चेट्टीयारों के बैंकिंग तथा व्यापारिक क्रियाकलाप के रूप में ले सकते हैं। वे उन्नीसवीं शताब्दी में बैंकिंग और व्यापार का नियंत्रण पूरी पूर्वी एशिया तथा सीलोन (नए श्रीलंका) में करते थे तथा संयुक्त परिवार के व्यवसाय का संचालन करते थे। इसको संयुक्त परिवार की पितृप्रधान संरचना कहा गया है

इससे यह पता है कि भारत में एक देशी पूँजीवादी व्यवस्था थी। जब व्यापार तथा उससे लाभ अर्जित किया जाता था, तब इसके केद्र में जाति तथा नातेदारी होती थी।
5. उपनिवेशवाद के आने के पश्चात् भारतीय अर्थव्यवस्था किन अथों में बदली?
उतर- उपनिवेशवाद के साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरे बदलाव देखने को मिले। इन बदलावों के अंतर्गत, व्यापार, उत्पादन और कृषि का विघटन हुआ। ब्रिटेन के बने सस्ते कपड़ों ने भारतीय हथकरघा उद्योग को समाप्त कर दिया तथा बुनकर बेकार हो गए। इस समय भारत विश्व की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से ओर अधिक जुड़ गया। इससे पहले भारत बने-बनाए सामानों के निर्यात का एक प्रमुख केंद्र था। उपनिवेशवाद के बाद भारत कच्चे माल और कृषक उत्पादों को स्रोत और उत्पादिक सामानों का उपभोक्ता बना
दिया गया।
यह दोनों कार्य ब्रिटेन के उद्योगों को लाभ पहुंचाने के लिए किए गए। पंरतु पहले से विद्यमान आर्थिक संस्थाओं को पूरी तरह से नष्ट करने के बजाय भारत में बाज़ार के विस्तार में कुछ व्यापारिक अर्थव्यवस्था समुदायों के लिए नए अवसर प्रदान किए गए, जिन्होंने बदली हुई आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको पुनर्गठित किया,साथ-ही-साथ अपनी स्थिति को उच्च बनाने के प्रयास भी किये।कुछ मामलों में, उपनिवेश द्वारा प्रदान किए गए आर्थिक सुअवसरों का लाभ उठाने के लिए नए समुदायों का जन्म हआ।इस प्रकार का सबसे अच्छा उदाहरण मारवाड़ी हैं, जो संभवत: भारत के हर हिस्से में हैं तथा जाना-माना व्यापारिक समुदाय हैं।
6. उदाहरणों की सहायता से 'पण्यीकरण' के अर्थ की विवेचना कीजिए।
उत्तर- 'पण्यीकरण' का अर्थ = पण्यीकरण तब होता है जब कोई वस्तु बाज़ार में पूर्व में खरीदी-बेची नहीं जा सकती हो, किंतु बाद में इसके योग्य हो।
1. अब श्रम और कौशल को खरीदा और बेचा जा सकता हैं।
2. अब सामाजिक विवाह ब्यूरो की भरमार है, जो वेबसाइट या किसी अन्य माध्यम से लोगों का विवाह तय करते हैं। पूर्व में पारंपरिक रीति-रिवाज घर के बड़ों के द्वारा किए जाते थे, पर अब यह ठेकेदारों के माध्यम से कराए जाते हैं।
3. मानव अंगों की बिक्री। उदाहरणत: पैसे के लिए गरीब लोगों द्वारा अमीर लोगों को अपनी किडनी कों बेचना।
4. अब पीने का पानी आज सामान्य वस्तु की तरह बोतलों में खरीद रहे हैं। अर्थात् वस्तुओं को हम खरीद और बेच सकते हैं।
7. 'प्रतिष्ठा का प्रतीक' क्या है?
उत्तर- 'प्रतिष्ठा का प्रतीक' का अर्थ =इस शब्द का प्रतिपादन मैक्स वेबर द्वारा किया गया। यह लोगों की सामाजिक अवस्था के अनुसार खरीदी जाने वाली वस्तुओं के मध्य के संबंध को दर्शाता है अर्थात् वे वस्तुएँ जिन्हें वे खरीदते तथा प्रयोग में लाते हैं। वे उनकी सामाजिक अवस्था से निकटतम संबंध रखती हैं।
उदाहरण , मोबाइल फोन के ब्रांड अथवा कारों के मॉडल सामाजिक-आर्थिक अवस्था के महत्वपूर्ण चिह्न हैं।
8. "भूमंडलीकरण' के तहत कौन-कौन सी प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं?
उत्तर- 'भूमंडलीकरण' के तहत निम्न प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं :
1. भूमंडलीकरण के युग में विश्व के अंतर्संबंध का तेजी से विस्तार हुआ है। यह अंतर्संबंध केवल आर्थिक ही नहीं है बल्कि सांस्कृतिक तथा राजनीतिक भी है।
2. भूमंडलीकरण के कई रुझान होते हैं, विशेष तौर पर, अन्तराष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं, पूंजी, समाचार, लोगो एवं तकनीक का विकास।
3. भूमंडलीकरण की एक केंद्रीय विशेषता दुनिया के चारों कोनों में बाज़ारों का विस्तार और एकीकरण को बढ़ाना है। उदाहरण, यदि अमेरिकी बाज़ार गिरावट आती है, तो भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग में भी गिरावट आएगी।
9. 'उदारीकरण' से क्या तात्पर्य है?
उत्तर- उदारीकरण = यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमे आर्थिक गतिविधियों पर सरकारी नियंत्रण को कम कर दिया जाता है तथा बाज़ार की शक्तियों को इसका निर्धारण करने के लिए मुक्त रखा जाता है।
•यह विदेशी कंपनियों को भारत में आने की सुविधा प्रदान करता है।
• इसे बाज़ार आधारित प्रक्रिया में काफी सहायता से आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक समस्याओं का समाधान भी कहा जाता हैं।
•इसमें सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण शामिल होता है।
10. आपकी राय में, क्या उदारीकरण के दूरगामी लाभ उसकी लागत की तुलना में अधिक हो जाएँगे? कारण सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर- उदारवाद के कार्यक्रम के तहत जो परिवर्तन हुए, उन्होने आर्थिक संवृद्धि को बढ़ाया और इसके साथ ही भारतीय बाज़ारों को विदेशी कंपनियों के लिए खोला | माना जाता है कि विदेशी पूँजी के निवेश से आर्थिक विकास होता है और रोज़गार बढ़ते हैं। सरकारी कंपनियों के निजीकरण से कुशलता बढ़ती है और सरकार पर दबाव कम होता है। हालाँकि उदारीकरण का असर मिश्रित रहा है, कई लोगों का यह भी मत है कि उदारीकरण का भारतीय परिवेश पर प्रतिकूल असर ही हुआ है और आगे के दिनों में भी ऐसा ही होगा।जहाँ तक मेरा मानना है, लागत और हानि, लाभ से कहीं अधिक ही होगी। सॉफ्टवेयर या सूचना तकनीक अथवा कृषि, जैसे मछली या फल उत्पादन के क्षेत्र में शायद विश्व बाज़ार में लाभ हो सकता है, लेकिन अन्य क्षेत्र; जैसे-ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, तैलीय अनाज आदि विदेशी कंपनियों के उत्पादों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएँगे।